कविता पेटशाली

कविता पेटशाली

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P.o.manan dist Almora

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Recent Articles


आंख में कुआँ बहुत गहरा है,,।।
आंख में कुआँ बहुत गहरा है,,।।

अच्छाई के पैर किना

कलम इक कमल मांगती है ,।
कलम इक कमल मांगती है ,।

ये ,कमल ,मांगती ,कलम,

यह पुकारती ,हिन्दी भाषा
यह पुकारती ,हिन्दी भाषा

कलम का आगाज ,कुछ ,इस ,

मेरा ज़िन्दगी से गहरा नाता है,,
मेरा ज़िन्दगी से गहरा नाता है,,

महसूस करा दूं ,एँ , ज

निहारा बहुत चाँद
निहारा बहुत चाँद

क्या? लिखूं कि ये श

अगर यह कागज इतना उड़ता नहीं,,।।
अगर यह कागज इतना उड़ता नहीं,,।।

अंतिम, आशा ,के, फूल,ल

कहां रही चूंक उनकी
कहां रही चूंक उनकी

मुनासिब नहीं मेरा

ये अधूरी सी तन्हाई
ये अधूरी सी तन्हाई

वक़्त ,की ,मुलाकात ,

वो जो मेरा है,,।।
वो जो मेरा है,,।।

मैं ,,सारे फासले यही

फिर कविता में प्रभात आए,,।।
फिर कविता में प्रभात आए,,।।

उम्र की सीमा नहीं ,ह

जब मेरे देश की बात होती है,,।।
जब मेरे देश की बात होती है,,।।

जब ,मेरे ,देश की बात

टूटती हूँ ,कभी कभी हां मगर उभरती हूँ, शीर्ष के साथ।
टूटती हूँ ,कभी कभी हां मगर उभरती हूँ, शीर्ष के साथ।

यह जो ख्वाब मेरे टू

टुटा कोई इस तरह
टुटा कोई इस तरह

जुबान कांट दी ,थी ,क

बहुत कुछ बोलती है ,हवा।।
बहुत कुछ बोलती है ,हवा।।

बुलंद ,शहर के दरवाज

लाखों कुर्बानी व्यर्थ नहीं तुम जाने दो ,,।।
लाखों कुर्बानी व्यर्थ नहीं तुम जाने दो ,,।।

सरहद ~सरहद बोल रहा त

जो गुजरी राह से
जो गुजरी राह से

शिला पर नाम लिखा कि

अपने पैर ,वापस नहीं आती,।
अपने पैर ,वापस नहीं आती,।

और ,फिर ,मुझे लिबाज ,

मौत बस बुलाती है,,।।
मौत बस बुलाती है,,।।

इस मौत को बहुत करीब

कलम और मेरी बाजी
कलम और मेरी बाजी

जहर घोलती ,दुनिया ,।

इक चहरे से मुंह नहीं मोड़ पाती हूँ,।।
इक चहरे से मुंह नहीं मोड़ पाती हूँ,।।

एक ,चेहरा नहीं ,लिख ,

आदत ही इबादत है,,
आदत ही इबादत है,,

जमीन पर देखने की आद

यह भीगता कागज
यह भीगता कागज

यादों की पुरवाई लौ

बीते ,भी ,तो कैसे ,रैन
बीते ,भी ,तो कैसे ,रैन

अरसे ,से ,बीती ,कहाँ,

सुकून पाती हूं
सुकून पाती हूं

जब, कभी जमाने से दिल

ख़त जो मैंने लिखे जिन्दगी
ख़त जो मैंने लिखे जिन्दगी

कितने ही ख़त लिखती

जहाँ बात सच की हो ,मैं एक पक्ष की हुआ करती हूँ,।कविता
जहाँ बात सच की हो ,मैं एक पक्ष की हुआ करती हूँ,।कविता

कैसे ,?पलट ,जाती ,अपन

मालुम पड़ा गहरा
मालुम पड़ा गहरा

जिन्होंने हमें शहर

लिखने की गुंजाईश,कहां,। इस सफर ,पर बिना छत के बरसात बहुत हैं,।
लिखने की गुंजाईश,कहां,। इस सफर ,पर बिना छत के बरसात बहुत हैं,।

मैं ,उस मुकाम ,पर हू

बेटियां ऐसे भी न मरने दो
बेटियां ऐसे भी न मरने दो

अखबारों ,की यह सुर्

मुस्कान जवाब मांगती है,।
मुस्कान जवाब मांगती है,।

इक ,सादा कागज जब मुस

तस्वीर नहीं हूँ,मैं कविता हूँ,।।
तस्वीर नहीं हूँ,मैं कविता हूँ,।।

सदृण सा इक रिश्ता अ

जन्मभूमि कभी नहीं भूलनी चाहिए
जन्मभूमि कभी नहीं भूलनी चाहिए

मैंने, पहाड़ों को म

की गाते गाते सबकुछ भुल जाते हैं,।
की गाते गाते सबकुछ भुल जाते हैं,।

ये लाइन आजकल के कवि

शीशे का टुटना लाजमी है,,
शीशे का टुटना लाजमी है,,

कहां रहती है, मुलाक

आदतन जो बेवफा हो ग्रे,
आदतन जो बेवफा हो ग्रे,

आज भी मेरा सीना भले

अहसास की सुगन्ध है,,
अहसास की सुगन्ध है,,

अरसे बाद,खुद को पहच

विभव में भोर हो जाए,,।।
विभव में भोर हो जाए,,।।

मैं ,,जीयूं इस तरह , क